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राजर्षि टंडन जी

राजर्षि टंडन जी 

ऋषियों जैसी शकल - सूरत में सीधे -सादे वेशभूषा वाले , त्यागी महापुरुष पुरुषोत्तमदास टंडन का नाम भारतवर्ष के चुने हुए आदरणीय नेताओं में बड़े श्रद्धा से लिया जाता है। 
सादगी और कम खर्च में जीवन बिताने का उनका उदाहरण हर देशवासी को ग्रहण करना चाहिए। 
टंडन जी का सम्पूर्ण जीवन त्याग और तपस्या तथा अनुशासन व शिष्टाचार की ओजपूर्ण कहानी रही है। 
बचपन से ही टंडन जी में देशप्रेम की भावना कूट -कूट कर भरी थी।  महामना प० मदनमोहन मालवीय के वे सच्चे शिष्य थे। हिन्दी भाषा के वे बेजोड़ सेवक व पुजारी थे।  हिन्दी की बात को लेकर उनमे और गांधी जी में कभी -कभी मतभेद भी हो जाता था।  लेकिन हिन्दी -प्रेम के आगे उन्होंने कभी किसी की सलाह नहीं मानी। 
मालवीय जी की प्रेरणा की प्रयाग में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की उन्होंने स्थापना की और सारा जीवन उसी संस्था के निर्माण में अर्पित कर दिया। 
आप की राष्ट्रीय व हिन्दी सेवाओं के लिए राष्ट्रपति डा० राजेन्द्र प्रसाद ने आप को सन 1961 में 'भारतरत्न ' की उपाधि प्रधान की जो अपने देश की सब से ऊँची उपाधि है।  जनता में टंडन जी  'राजर्षि टंडन' के नाम से प्रसिद्ध थे। 

जन्म - इलाहबाद , 1 अगस्त 1882 
निधन -इलाहबाद, 1 जुलाई 1962

1 comment:

Act As said...

Very informative continue it bhii

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